Janmashtami 2020 | ShriKrishna Janmashtami | जन्माष्टमी मुहूर्त | जन्माष्टमी व्रत कथा एवं पूजा विधि

 

Janmashtami 2020

 

कृष्ण जी भगवान विष्णु के अवतार थे और वे यह बात जानते थे कि कंस उन्हें मारना चाहते थे, फिर भी वे शांत रहे और समय आने पर कंस के हर प्रहार का मुंहतोड़ जवाब दिया। इससे सीख मिलती है कि कठिन समय में भी अपने मन को शांत रखना चाहिए। विपरीत परिस्थितियों में भी शान्त स्वभाव का त्याग नहीं करना चाहिए। भगवान कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की मिसाल हर कोई देता है। यह दोस्ती महज दोनों के प्रेम के कारण नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति आदर के कारण भी प्रसिद्ध है। श्रीकृष्ण ने हमेशा अपने मित्र सुदामा और अर्जुन का साथ दिया था।

 

Janmashtami 2020


12 अगस्त को जन्माष्टमी के दिन विशेष योग बन रहा है

 

इस बार जन्माष्टमी पर एक विशेष योग बन रहा है, जो व्रत करने वालों के लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध होगा। 12 अगस्त पर कृतिका नक्षत्र लगेगा। यही नहीं, चंद्रमा मेष राशि और सूर्य कर्क राशि में रहेंगे। कृतिका नक्षत्र और राशियों की इस स्थिति वृद्धि योग बना रही है।

 

क्या है शुभ मुहूर्त?

 

जन्माष्टमी पर विशेष पूजन व संकीर्तन मुहूर्त

लाभ अमृत मुहूर्त    सुबह 10:46 से दोपहर 2:05 तक

शुभ मुहूर्त    तीसरे पहर 3:44 से शाम 5:24 तक

लाभ मुहूर्त    रात 8:24 से रात 9:44 तक

जन्म, अभिषेक-आरती मध्य रात्रि 12:04 से 12:47 तक

 

अष्टमी तिथि 11 अगस्त मंगलवार सुबह 9:06 बजे से शुरू हो जाएगी। यह तिथि 12 अगस्त सुबह 11:16 मिनट तक रहेगी। अगर रोहिणी नक्षत्र की बात करें तो इसकी शुरुआत 13 अगस्त को तड़के 03:27 मिनट से होगी और इसका समापन 05:22 मिनट पर होगा।  वैष्णव जन्माष्टमी के लिए 12 अगस्त का शुभ मुहूर्त बताया जा रहा है। पूजा का शुभ समय रात 12 बजकर 5 मिनट से लेकर 12 बजकर 47 मिनट तक है। अगर बुधवार की रात को बताए गए मुहूर्त में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाए तो उससे दोगुना फल प्राप्त होगा। 12 अगस्त को व्रत रखने, पूजा करने और मुहूर्त का ध्यान रखकर जन्मोत्सव होने से व्रती को लाभ मिलेगा।

 

जन्माष्टमी पूजा का फल


 

जन्माष्टमी पूजा



श्री कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है. इस दिन भक्त व्रत और पूजा-पाठ करते हैं. ऐसी मान्यता है कि ये त्यौहार मनाकर हर मनोकामना पूरी की जा सकती है. कमजोर चंद्रमा वाले लोग इस दिन विशेष पूजा करके लाभ की प्राप्त कर सकते हैं. इस खास दिन श्रीकृष्ण की पूजा करने से दीर्घायु, सुख-समृद्धि और संतान की प्राप्ति भी हो सकती है. कहा जाता है कि इस दिन व्रत करने से कई व्रतों का फल मिल जाता है. श्री कृष्ण जन्माष्टमी को सभी व्रतों का राजा यानी कि ‘व्रतराज’ भी कहा जाता है. इस दिन बाल गोपाल को झूला झुलाने से भी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं.

 

जन्माष्टमी व्रत एवं पूजा  विधि

 

जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा और भक्ति के लिए उपवास करें। अपने घर की विशेष सजावट करें। उपवास के दिन सुबह ब्रह्ममुहू्र्त में उठकर स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं। यह व्रत आप फलाहार भी कर सकते हैं। हाथ में जल, फल, कुश और गंध लें और व्रत का संकल्प करें। प्रतिमा को स्थापित करने से पहले बाल-गोपाल को गंगाजल से स्नान कराया जाता है और नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। इसके बाद ही उन्हें स्थापित किया जाता है। अगर आपके पास मूर्ति नहीं है तो आप चित्र से भी पूजा कर सकते हैं। घर के अंदर सुन्दर पालने में बालरूप श्रीकृष्ण की मूर्ति स्थापित करें। ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय का जाप करें। भगवान श्रीकृष्ण को वैजयंती के पुष्प प्रिय हैं। उन्हें वैजयंती के पुष्प अर्पित करें। जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को दक्षिणावर्ती शंख से अभिषेक कर पंचामृत अर्पित करना चाहिए। माखन मिश्री का भोग लगाएं। रात 12 बजे चंद्र को देखकर कृष्ण जी झूला झुलाएं और उनका जन्मोत्सव मनाएं। कृष्ण जी की आरती करें और मंत्रोच्चारण करें। श्रीकृष्ण की पूजन के पश्चात प्रसाद का वितरण करें। विद्वानों, माता-पिता और गुरुजनों के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लें। भगवान श्रीकृष्ण पीतांबरधारी भी कहलाते हैं। जन्माष्टमी के दिन किसी मंदिर में पीले रंग के कपड़े, पीले फल, पीला अनाज व पीली मिठाई का दान अवश्य करें।

 

जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण को लगाया जाता है 56 भोग


क्या है 56 भोग?


भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग देने की भी परंपरा है. धार्मिक मान्यता है कि छप्पन भोग से भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं.

56 भोग को लेकर प्रचलित कथा के अनुसार भगवान कृष्ण को मां यशोदा दिन में आठ बार यानि आठों पहर भोजन कराती थी. एक बार जब ब्रजवासियों से नाराज होकर इंद्र ने घनघोर वर्षा कर दी तो भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों की रक्षा के गोवर्धन पर्वत को अपनी ऊंगली पर उठा लिया. श्रीकृष्ण सात दिन गोवर्धन पर्वत को अपनी ऊंगली पर उठाए रहे इस दौरान ब्रज के लोगों, पशु पक्षियों ने गोवर्धन के नीच शरण ली. सात दिन बाद जब वर्षा समाप्त हो गई तो सभी गोवर्धन के नीच से बाहर निकले.

सात दिनों तक भगवान कृष्ण ने बिना खाएं-पीएं गोवर्धन पर्वत को अपनी ऊंगली पर उठाए रखा. कृष्ण जी आठ बार भोजन करते थे. माता यशोदा और सभी ने मिलकर आठ प्रहर के हिसाब से कृष्ण जी के लिए 56 भोग बनाए. ऐसा कहा जाता है कि तभी से 56 भोग लगाने की परंपरा शुरु हुई.

 

क्या है 56 भोग?


छप्पन भोग में भक्त अपने-अपने हिसाब चीजें तय करते हैं. सामान्यत: 56 भोग में माखन मिश्री, खीर, बदाम का दूध, टिक्की, काजू, बादाम, पिस्ता, रसगुल्ला, जलेबी, लड्डू, रबड़ी, मठरी, मालपुआ, मोहनभोग, चटनी, मूंग दाल का हलवा, पकौड़ा, खिचड़ी, बैंगन की सब्जी, लौकी की सब्जी, पूरी, मुरब्बा, साग, दही, चावल, इलायची, दाल, कढ़ी, घेवर चिला, पापड़ आदि शामिल किए जाते हैं. कुछ भक्त 20 तरह की मिठाई, 16 तरह की नमकीन और 20 तरह के ड्राई फ्रूट्स भगवान श्रीकृष्ण को चढ़ाते हैं.

 

जन्माष्टमी व्रत कथा (Janmashtami Vrat Katha):


स्‍कंद पुराण के मुताबिक द्वापर युग की बात है। तब मथुरा में उग्रसेन नाम के एक प्रतापी राजा हुए। लेकिन स्‍वभाव से सीधे-साधे होने के कारण उनके पुत्र कंस ने ही उनका राज्‍य हड़प लिया और स्‍वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन थी, जिनका नाम था देवकी। कंस उनसे बहुत प्रेम करता था। देवकी का विवाह वसुदेव से तय हुआ तो विवाह संपन्‍न होने के बाद कंस स्‍वयं ही रथ हांकते हुए बहन को ससुराल छोड़ने के लिए रवाना हुआ। जब वह बहन को छोड़ने के लिए जा रहे था तभी एक आकाशवाणी हुई कि देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान कंस की मृत्यु का कारण बनेगी। यह सुनते ही कंस क्रोधित हो गया और देवकी और वसुदेव को मारने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा तभी वसुदेव ने कहा कि वह देवकी को कोई नुकसान न पहुंचाए। वह स्‍वयं ही देवकी की आठवीं संतान कंस को सौंप देगा। इसके बाद कंस ने वसुदेव और देवकी को मारने के बजाए कारागार में डाल दिया।

कारागार में ही देवकी ने सात संतानों को जन्‍म दिया और कंस ने सभी को एक-एक करके मार दिया। इसके बाद जैसे ही देवकी फिर से गर्भवती हुईं तभी कंस ने कारागार का पहरा और भी कड़ा कर दिया। तब भाद्रपद माह के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी को रोहिणी नक्षत्र में कन्‍हैया का जन्‍म हुआ। तभी श्री विष्‍णु ने वसुदेव को दर्शन देकर कहा कि वह स्‍वयं ही उनके पुत्र के रूप में जन्‍में हैं। उन्‍होंने यह भी कहा कि वसुदेव जी उन्‍हें वृंदावन में अपने मित्र नंदबाबा के घर पर छोड़ आएं और यशोदा जी के गर्भ से जिस कन्‍या का जन्‍म हुआ है, उसे कारागार में ले आएं। यशोदा जी के गर्भ से जन्‍मी कन्‍या कोई और नहीं बल्कि स्‍वयं माया थी। यह सबकुछ सुनने के बाद वसुदेव जी ने वैसा ही किया।


जन्माष्टमी व्रत


स्‍कंद पुराण के मुताबिक जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के बारे में पता चला तो वह कारागार पहुंचा। वहां उसने देखा कि आठवीं संतान तो कन्‍या है फिर भी वह उसे जमीन पर पटकने ही लगा कि वह मायारूपी कन्‍या आसमान में पहुंचकर बोली कि रे मूर्ख मुझे मारने से कुछ नहीं होगा। तेरा काल तो पहले से ही वृंदावन पहुंच चुका है और वह जल्‍दी ही तेरा अंत करेगा। इसके बाद कंस ने वृंदावन में जन्‍में नवजातों का पता लगाया। जब यशोदा के लाला का पता चला तो उसे मारने के लिए कई प्रयास किए। कई राक्षसों को भी भेजा लेकिन कोई भी उस बालक का बाल भी बांका नहीं कर पाया तो कंस को यह अहसास हो गया कि नंदबाबा का बालक ही वसुदेव-देवकी की आठवीं संतान है। कृष्‍ण ने युवावस्‍था में कंस का अंत किया। इस तरह जो भी यह कथा पढ़ता या सुनता है उसके समस्‍त पापों का नाश होता है।


जन्माष्टमी व्रत में न करें ये काम


मान्यता है कि जिस घर में भगवान की पूजा की जाती हो या कोई व्रत रखता हो उस घर के सदस्यों को जन्माष्टमी के दिन लहसुन और प्याज जैसी तामसिक चीजों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस दिन पूरी तरह से सात्विक आहार की ग्रहण करना चाहिए।

भगवान श्रीकृष्ण को गौ अति प्रिय हैं। इस दिन गायों की पूजा और सेवा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। किसी भी पशु को सताना नहीं चाहिए।

एकादशी और जन्माष्टमी के दिन चावल या जौ से बना भोजन नहीं खाना चाहिए। चावल को भगवान शिव का रूप भी माना गया है।

जन्माष्टमी के दिन स्त्री-पुरुष को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। ऐसा न करने वालों को पाप लगता है।

जन्माष्टमी का व्रत करने वाले को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म होने तक यानी रात 12 बजे तक व्रत का पालन करन चाहिए। इससे पहले अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए।